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बिहार में शराबबंदी का नौ साल: फायदे, चुनौतियां और समीक्षा की बहस

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पटना: अप्रैल 2016 में बिहार में लागू हुई पूर्ण शराबबंदी अब नौ साल पूरे कर चुकी है। शुरू में यह कानून महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा में कमी और सामाजिक शांति सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया था। शुरुआती वर्षों में कानून बेहद कड़ा था। घर में शराब मिलने पर पूरे परिवार पर कार्रवाई और जेल की सजा का प्रावधान था। गाड़ी में शराब मिलने पर वाहन जब्त किया जाता था। समय के साथ सरकार को संशोधन करना पड़ा। 2018 में संशोधन हुआ जिसमें पहली बार पकड़े जाने पर जुर्माना और रिहाई का प्रावधान, दूसरी बार पकड़े जाने पर सख्त कारावास का प्रावधान रखा गया। शराबबंदी से महिलाओं की सुरक्षा में वृद्धि हुई, घरेलू हिंसा में कमी आई, मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ और परिवारों में शांति बनी। NFHS-5 के आंकड़े भी इसे पुष्ट करते हैं, जिसमें अधिकांश महिलाओं ने कहा कि उनके परिवार में शराब के कारण उत्पन्न हिंसा में कमी आई। विशेषज्ञ मानते हैं कि शराबबंदी ने सामाजिक सुधार और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की, लेकिन आर्थिक नुकसान और अवैध शराब के कारोबार ने इसे चुनौतीपूर्ण बना दिया। राज्य में अवैध शराब का कारोबार तेजी से बढ़ा है और जहरीली शराब से 2016 से 2025 के बीच लगभग 190 मौतें हुई। शराबबंदी लागू होने से राज्य को हर साल लगभग 40000 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हुआ जबकि इसे लागू करने में सरकार को 800–1000 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष खर्च करने पड़ रहे हैं। इसके बावजूद कई युवा वैकल्पिक नशे की ओर बढ़ गए हैं। इसके तहत गंजा, ब्राउन शुगर, नशीली गोलियां और सूखा नशा का प्रयोग बढ़ा है। एनडीपीएस एक्ट के तहत मामलों की संख्या भी चार गुना बढ़ गई। सत्ता पक्ष के कुछ विधायक और राजनीतिक घटक अब शराबबंदी की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि कानून के पालन में कई समस्याएं सामने आई हैं और अवैध शराब का कारोबार राज्य में जारी है। विश्लेषकों का कहना है कि कानून की समीक्षा करना जरूरी है, ताकि इसे पारदर्शी, सख्त और प्रभावी बनाया जा सके। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार कहते रहे हैं कि शराबबंदी से घरेलू हिंसा में कमी आई और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरी है। जेडीयू का आधिकारिक रुख अब भी कानून के समर्थन में है। शराबबंदी लागू होने के बाद राज्य में अमन चैन है, अब कोई शराब पीकर इधर-उधर नहीं करता। इसके बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि कानून को नई सख्ती, पारदर्शिता और अवैध शराब रोकने की रणनीति के साथ लागू करना होगा। तभी इसका उद्देश्य सफल हो सकेगा। कुल मिलाकर बिहार में शराबबंदी ने सामाजिक सुधार और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की है लेकिन इसे पूरी तरह प्रभावी बनाने के लिए समीक्षा और कड़ाई से पालन अनिवार्य है।

संपादकीय:

बिहार में शराबबंदी ने सामाजिक स्तर पर सकारात्मक असर डाला है। महिलाओं की सुरक्षा बढ़ी, घरेलू हिंसा में कमी आई और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ। बावजूद इसके अवैध शराब का कारोबार, जहरीली शराब से होने वाली मौतें और राजस्व का नुकसान कानून की चुनौतियों को उजागर करते हैं। अब जरूरी है कि सरकार समीक्षा कर कानून को कड़ाई और पारदर्शिता के साथ लागू करे, ताकि शराबबंदी का मूल उद्देश्य—सुरक्षा, सामाजिक शांति और स्वास्थ्य—पूरी तरह हासिल हो सके।

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